भारतीय संस्कृति में जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया गया है – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। इन चारों आश्रमों में से गृहस्थ आश्रम को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। कारण यह है कि गृहस्थ ही वह आधार है, जिस पर समाज, संस्कृति और धर्म की नींव टिकी होती है।
गृहस्थ आश्रम का महत्व
गृहस्थ आश्रम का अर्थ है – विवाह के बाद का जीवन, जब व्यक्ति न केवल स्वयं की, बल्कि परिवार और समाज की भी जिम्मेदारी निभाता है।
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समाज का आधार स्तंभ – ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास – तीनों ही आश्रमों को जीवन के लिए आवश्यक साधन गृहस्थ ही प्रदान करता है। इसलिए इसे ‘आश्रमों का राजा’ कहा गया है।
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धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का संतुलन – गृहस्थ जीवन में ही मनुष्य चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति कर सकता है। परिवार चलाते हुए धर्म का पालन, अर्थ की कमाई, काम की मर्यादा और अंततः मोक्ष की साधना यही संभव है।
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त्याग और सेवा का जीवन – गृहस्थ केवल स्वयं के लिए नहीं जीता। वह अपने परिवार, बच्चों, माता-पिता, समाज और जरूरतमंदों की सेवा करता है। यही सेवा उसकी साधना बन जाती है।
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संस्कारों का संरक्षण – गृहस्थ जीवन में ही बच्चों को संस्कार, शिक्षा और धर्म की परंपरा सौंपी जाती है। यही भविष्य की पीढ़ियों की नींव है।
धर्मग्रंथों में गृहस्थ आश्रम की महिमा
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मनुस्मृति में कहा गया है कि गृहस्थ ही तीनों आश्रमों को भोजन और संसाधन देकर जीवित रखता है।
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महाभारत में भी उल्लेख है – "गृहस्थाश्रम ही सबका पालन करता है।"
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संत तुलसीदास ने भी लिखा है कि गृहस्थ धर्म आचरण करने वाला ही सच्चा साधक होता है।
आधुनिक दृष्टिकोण से गृहस्थ आश्रम
आज के समय में भी गृहस्थ आश्रम का महत्व उतना ही है।
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यहाँ से व्यक्ति जिम्मेदारी, त्याग, प्रेम और धैर्य सीखता है।
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पारिवारिक जीवन ही इंसान को वास्तविक इंसान बनाता है।
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यदि परिवार सुखी है तो समाज और राष्ट्र भी सुखी रहेगा।
गृहस्थ आश्रम को श्रेष्ठ इसलिए कहा गया है क्योंकि यह केवल जीवन जीने की पद्धति नहीं, बल्कि धर्म और समाज की धुरी है। गृहस्थ ही धर्म की गंगा को प्रवाहित रखता है और यही वह आश्रम है, जहाँ से जीवन का असली आनंद और मोक्ष की दिशा दोनों प्राप्त होते हैं।
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