बुधवार, 27 अगस्त 2025

विघ्नहर्ता गणेश : श्रद्धा, संस्कृति और आधुनिक जीवन में महत्व

 

🌸 हर आरंभ गणेश से

भारतीय संस्कृति में जब भी कोई शुभ कार्य शुरू होता है तो सबसे पहले गणेश जी की वंदना की जाती है। उन्हें ‘विघ्नहर्ता’ और ‘सिद्धिदाता’ कहा जाता है। उनके आशीर्वाद से ही कार्य सफल और मंगलमय माने जाते हैं।

भारत की आस्था में अनेक देवताओं का वास है, किंतु श्रीगणेश का स्थान सबसे अनूठा और विशिष्ट है। हर मंगल कार्य की शुरुआत गणेश जी के नाम से होती है। उन्हें ‘विघ्नहर्ता’ यानी बाधाओं को दूर करने वाला तथा ‘सिद्धिदाता’ अर्थात सफलता प्रदान करने वाला देवता माना जाता है।


प्राचीन कथा और प्रतीक

शिव-पार्वती पुत्र गणेश जी का स्वरूप अत्यंत गूढ़ और प्रतीकात्मक है। उनका हाथीमुख ज्ञान और बुद्धिमत्ता का प्रतीक है, जबकि छोटा शरीर विनम्रता और सरलता का द्योतक है। बड़े कान सुनने की क्षमता और समझदारी का संदेश देते हैं, तो छोटी आँखें एकाग्रता का महत्व समझाती हैं। पेट का विशाल आकार सहनशीलता और धैर्य का द्योतक है।


🐘 स्वरूप का संदेश

गणेश जी का प्रत्येक अंग जीवन-दर्शन देता है –

  • बड़ा मस्तक : बड़ा सोचो, बड़ी दृष्टि रखो।

  • छोटी आँखें : एकाग्र रहो।

  • बड़े कान : अधिक सुनो, कम बोलो।

  • मूषक वाहन : इच्छाओं पर नियंत्रण रखो।

  • विशाल उदर : धैर्य और सहनशीलता अपनाओ।


संस्कृति और परंपरा

भारत ही नहीं, विश्व के अनेक हिस्सों में गणेश जी की पूजा की जाती है। महाराष्ट्र का गणेश उत्सव तो आज विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, कला और संस्कृति का उत्सव बन चुका है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने आज़ादी की लड़ाई के समय इस पर्व को जन-जागरण का माध्यम बनाया था।


🕉️ संस्कृति और समाज

  • महाराष्ट्र का गणेश उत्सव केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है।

  • लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इस उत्सव को आज़ादी के आंदोलन का माध्यम बनाया था।

  • आज यह पर्व भारत से निकलकर विदेशों तक मनाया जा रहा है।


आधुनिक दृष्टिकोण

आज के तनावपूर्ण और प्रतिस्पर्धात्मक युग में गणेश जी की शिक्षाएँ और भी प्रासंगिक हो गई हैं।

  • उनका बड़ा मस्तक हमें ‘बड़ा सोचने’ की प्रेरणा देता है।

  • छोटे नेत्र हमें एकाग्र रहकर लक्ष्य साधने का संदेश देते हैं।

  • और उनका वाहन मूषक (चूहा) बताता है कि इच्छाएँ कितनी भी तीव्र क्यों न हों, नियंत्रित कर ली जाएं तो सफलता निश्चित है।


पर्यावरणीय संदेश

गणेश उत्सव आज एक पर्यावरणीय चेतना का माध्यम भी बन रहा है। मिट्टी से बने गणेश प्रतिमाएँ, प्राकृतिक रंगों का प्रयोग और जल संरक्षण की पहल हमें यह सिखाती है कि आस्था और पर्यावरण का संतुलन बनाए रखना समय की मांग है।


गणेश जी केवल पूजनीय देवता ही नहीं, बल्कि जीवन की चुनौतियों से निपटने की कला सिखाने वाले आदर्श भी हैं। उनके स्वरूप और शिक्षाओं में आधुनिक जीवन की सभी कठिनाइयों के समाधान छिपे हैं। यही कारण है कि सदियों से हर आरंभ गणपति की वंदना से होता आया है और आगे भी होता रहेगा।

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